वर्दी के पीछे छिपा दर्द: ट्रांसफर की आस में हर साल टूटते हैं हजारों पुलिसकर्मियों के सपने मड़िहान

कंधों पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिसकर्मी आज खुद एक ऐसी व्यवस्था के सामने बेबस नजर आते हैं, जहां उनकी वर्षों पुरानी उम्मीदें फाइलों में दम तोड़ देती हैं। अपराधियों से मुकाबला करने वाला सिपाही जब अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा, बच्चों की पढ़ाई और परिवार के साथ रहने की इच्छा लेकर स्थानांतरण की गुहार लगाता है, तो उसे अक्सर केवल आश्वासन और इंतजार ही मिलता है।
हर वर्ष पुलिस मुख्यालय द्वारा ग्रीष्मकालीन स्थानांतरण के लिए विकल्प मांगे जाते हैं। सैकड़ों किलोमीटर दूर तैनात पुलिसकर्मी अपने मनपसंद तीन जिलों का चयन करते हैं और यह उम्मीद पाल लेते हैं कि इस बार शायद उनकी वर्षों की पीड़ा खत्म होगी। उन्हें लगता है कि मई-जून तक स्थानांतरण हो जाएगा, बच्चों का नए स्कूल में दाखिला करा पाएंगे, बुजुर्ग माता-पिता के पास रह सकेंगे और मानसिक शांति के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभा सकेंगे। लेकिन जब स्थानांतरण सूची नहीं आती, तो उम्मीदों का एक और साल बीत जाता है।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब सैकड़ों किलोमीटर दूर जिलों में तैनात पुलिसकर्मी अनुमति लेकर बार-बार लखनऊ स्थित पुलिस मुख्यालय पहुंचते हैं। कई पुलिसकर्मी एक वर्ष में छह से सात बार तक अधिकारियों के सामने अपनी व्यथा रखने जाते हैं। हर बार उन्हें उम्मीद होती है कि इस बार उनकी समस्या सुनी जाएगी, लेकिन लौटते समय उनके चेहरे पर वही निराशा और मन में वही अधूरी उम्मीद होती है।
पुलिसकर्मियों का कहना है कि वर्ष 2019 में अनुकंपा के आधार पर स्थानांतरण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत प्रभावी रही थी, लेकिन उसके बाद से यह व्यवस्था लगभग ठहर सी गई है। आरोप है कि अब सामान्य पुलिसकर्मियों के स्थानांतरण बहुत कम होते हैं, जबकि प्रभावशाली सिफारिश या न्यायालय के आदेश वाले मामलों को प्राथमिकता मिल जाती है। ऐसे में वर्षों से सेवा दे रहे कर्मियों के मन में उपेक्षा की भावना घर करने लगी है।
विडंबना यह है कि पुलिस विभाग में सिपाही को व्यवस्था की "रीढ़ की हड्डी" कहा जाता है। किसी भी वीआईपी दौरे, कानून-व्यवस्था की चुनौती, प्राकृतिक आपदा या अप्रिय घटना के समय सबसे पहले वही मोर्चा संभालता है। त्योहार हो या चुनाव, दिन हो या रात, वह अपने परिवार से दूर रहकर जनता की सुरक्षा में लगा रहता है। लेकिन जब बात उसके अपने परिवार की आती है, तो उसकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है।
कई पुलिसकर्मी बताते हैं कि उनके बूढ़े माता-पिता बीमारी और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। परिवार वर्षों तक बिखरा रहता है। मानसिक तनाव का असर उनकी कार्यक्षमता पर भी पड़ता है। इसके बावजूद वे कर्तव्यपथ से नहीं हटते और उम्मीद का दामन थामे रहते हैं।
पुलिसकर्मियों की मांग है कि स्थानांतरण नीति को पारदर्शी बनाया जाए और जिस प्रक्रिया के तहत गृह जनपद से तीसरे जिले में तैनाती का प्रावधान है, उसका ईमानदारी से पालन किया जाए। अनुकंपा के आधार पर लंबित मामलों पर गंभीरता से विचार हो ताकि जवान अपने परिवार की जिम्मेदारियों का भी निर्वहन कर सकें।
वर्दी पहनने वाला हर पुलिसकर्मी केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि किसी का बेटा, पिता, पति और परिवार का सहारा भी होता है। उसकी पीड़ा को समझना और उसके मनोबल को बनाए रखना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का भी प्रश्न है। यदि पुलिसकर्मी मानसिक रूप से संतुष्ट और पारिवारिक रूप से सुरक्षित होगा, तभी वह पूरी निष्ठा और ऊर्जा के साथ समाज और सरकार की सेवा कर सकेगा।

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